दुनिया में बढ़ रही तानाशाही, उदार लोकतंत्र वाले देशों की संख्या 41 से घटकर 32, इससे भी बड़ा फायदा उठा रहा चीन, जानिए कैसे


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Highlights

  • कम हो रही उदार लोकतंत्र वाले देशों की संख्या
  • चीन कई तरह से फायदा उठाने की कोशिश में
  • सत्तावाद का तेजी से विस्तार कर रहा है चीन

Democratic Recession China: पिछले एक दशक में, उदार लोकतंत्र माने जाने वाले देशों की संख्या 41 से घटकर 32 रह गई है। यानी 1989 में दुनिया में लोकतांत्रिक देशों की संख्या के बराबर। इसी अवधि में 87 अन्य देशों को निरंकुश या निर्वाचित निरंकुश का दर्जा दिया गया। इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट द्वारा 2021 के एक सर्वेक्षण से पता चला है कि दुनिया की केवल 8.4 फीसदी आबादी पूरी तरह से प्रभावी लोकतंत्र में रहती है, इस बदलाव को ‘लोकतांत्रिक मंदी’ के रूप में संदर्भित किया जा रहा है। कई लोगों, हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन, तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन और फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते जैसे नेताओं ने इस प्रवृत्ति को बढ़ाने में योगदान दिया है। उन्होंने आलोचनात्मक मीडिया को बंद करके अपनी घरेलू राजनीतिक व्यवस्था को कमजोर कर दिया और चुनावों को कमजोर कर दिया है। 

ऐसे नेता अपनी न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कम कर रहे हैं या कम करने का प्रयास कर रहे हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों और स्वतंत्रता का क्रमिक क्षरण, जैसे ब्रिटेन में विरोध के अधिकार पर हालिया प्रतिबंध और सत्तावाद की ओर यह गिरावट, चीन के लिए अपने मूल्यों के साथ वैश्विक एजेंडा पर हावी होने के लिए और अधिक जगह बना रही है। महत्वपूर्ण रूप से, इस तरह का एक सत्तावादी झुकाव अब अमेरिका और ब्रिटेन जैसे लोकतांत्रिक देशों में राजनीति का प्रतीक बनने लगा है। जैसे-जैसे ये देश कम लोकतांत्रिक होते जाते हैं, वैसे-वैसे वे सत्तावाद को फलने-फूलने के लिए अधिक स्थान दे रहे हैं। 

ट्रंप ने उठाया था मीडिया पर सवाल

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुले तौर पर अमेरिकी लोकतंत्र की नींव पर सवाल उठाया। ‘फर्जी समाचार’ मीडिया के सदस्यों पर उनके हमलों ने एक स्वतंत्र प्रेस की भूमिका को खारिज कर दिया, जिससे संविधान और मानवाधिकार कमजोर हो गए। बदले में, मतदाता दमन पर नीतियां बनीं, जो लोगों के विशिष्ट समूहों को मतदान से हतोत्साहित करती हैं, पुनर्सीमांकन (सरकार में पार्टी के पक्ष में एक निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं को बदलना) और न्याय प्रणाली के राजनीतिकरण के बाद खुलेतौर पर उन न्यायाधीशों पर हमला किया गया, जिन्होंने उनके प्रशासन की नीतियों के खिलाफ फैसले सुनाए थे। इन सब कार्यों से कहीं न कहीं लोकतंत्र कमजोर हुआ। ट्रंप के समय में अल्पसंख्यक समूहों के खिलाफ कथित घृणा अपराधों में भी बड़ी वृद्धि हुई थी।

 
ट्रंप के बाद, 2021 के मध्य तक, अमेरिका में मुख्य रूप से रिपब्लिकन-नियंत्रित राज्य विधानसभाओं में मतदाता दमन पर 400 से अधिक बिल लंबित थे, और 230 से अधिक बिल अपराधीकरण विरोध पर लंबित थे। इन्हीं कारणों से रिपब्लिकन पार्टी के कई सदस्यों ने 2020 के राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। ऐसा करके, रिपब्लिकन पार्टी ने पूरी राजनीतिक व्यवस्था से जनता के विश्वास को मिटाने का काम किया है। यूके में प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की लोकलुभावन सरकार ने 2019 में अवैध रूप से संसद को निलंबित कर दिया। उनकी सरकार ने अनिवार्य मतदाता पहचान पत्र भी शुरू किया, जिसकी मतदान को प्रतिबंधित करने के तरीके के रूप में आलोचना की गई है। 

राष्ट्रपति चुनाव की अराजकता सामने आई

कई अन्य कानून स्वतंत्र निगरानी प्रणाली और शक्तिशाली को जवाबदेह ठहराने की मीडिया और न्यायपालिका की क्षमता को सीमित कर रहे हैं। सत्तावादी नेताओं ने 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की अराजकता को उजागर किया। कोलंबिया के पब्लिमेट्रो अखबार ने शीर्षक छापा, ‘अब बनाना रिपब्लिक कौन है?’ और चीन के सरकारी मीडिया ने कहा कि अमेरिका ‘कुछ कुछ एक विकासशील देश की तरह’ लगता है। चीन के लिए इसका क्या मतलब है? चीन की आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक नीतियां बीजिंग को वैश्विक मंच पर अपनी राजनीति की शैली को तेजी से बढ़ावा देने में मदद कर रही हैं। 

इसकी विदेश नीति अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के माध्यम से विकासशील देशों, विशेष रूप से अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में 8 खरब अमेरिकी डॉलर तक के निवेश का प्रावधान करती है। परियोजना का नाम 2,000 साल पहले के ऐतिहासिक सिल्क रूट से लिया गया है, जो चीन से जुड़े शक्तिशाली व्यापारिक मार्गों की एक श्रृंखला है। दुनिया भर में बंदरगाहों, पुलों और प्रमुख बुनियादी ढांचे में निवेश की इस श्रृंखला ने चीन का दबदबा बहुत बढ़ा दिया है। चीन ने अन्य देशों को निगरानी प्रणाली (जिसका उपयोग नकारात्मक जनमत को ऑनलाइन सेंसर करने के लिए किया जा सकता है) और निगरानी तकनीक बेचकर एक मजबूत पहचान बनाई है। इसने अपनी सामाजिक ऋण प्रणाली को कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और मंगोलिया को भी निर्यात किया है। ये ब्लैक मिरर-शैली की प्रणालियां हैं, जहां सरकारें लोगों को उन कार्यों के लिए जिम्मेदार ठहरा सकती हैं, जिन्हें अधिकारी अनुमोदित करते हैं। 

सत्तावादी देशों को मदद कर रहा चीन

यह घटनाक्रम चिंताजनक है क्योंकि चीन अब अन्य सत्तावादी दिमाग वाले देशों को तकनीकी साधनों का निर्यात कर रहा है (जिसके माध्यम से उसने लगभग पूर्ण सामाजिक और राजनीतिक नियंत्रण हासिल कर लिया है)। पिछले कई वर्षों से, बीजिंग संयुक्त राष्ट्र की बैठकों में सार्वभौमिक मानवाधिकारों के विचार पर सवाल उठाता रहा है। 2018 में इसने अनुरोध किया कि ‘मानवाधिकार रक्षक’ वाक्यांश को संयुक्त राष्ट्र के शब्दकोष से हटा दिया जाए। अगर वह इन अधिकारों के विचार को मिटाने में सक्षम रहा तो यह लोकतंत्र में सत्तावादी प्रथाओं के विस्तार के लिए और अधिक रास्ते खोलेगा। बीजिंग वर्तमान में दुनिया को व्यवस्थित करने का एक वैकल्पिक तरीका बना रहा है। चीन का सफल सत्तावादी-पूंजीवादी मॉडल इस दृष्टि को रेखांकित करता है। 

चीन प्रतिस्पर्धी अंतरराष्ट्रीय संस्थान भी बना रहा है (जैसे एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक और शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन। यह व्यापक लोकतांत्रिक पतन के साथ-साथ, सत्तावाद के इर्द-गिर्द एक बढ़ता हुआ वैश्विक जाल है। अगर ये रुझान वैश्विक राजनीति पर हावी हो जाते हैं, तो पश्चिम में बचे शेष लोकतांत्रिक अधिकारों को गहरा खतरा होगा। सबसे बुरी स्थिति में, उन्हें पूरी तरह से दमनकारी सरकारों द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है, एक नई चीन केंद्रित विश्व व्यवस्था की शुरुआत और एक सत्तावादी सदी की शुरुआत।

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