नस्लों के कत्लेआम से जुड़ा है रूस का ‘विजय-दिवस’, जर्मन सैनिकों की मात और अब यूक्रेन से जंग… इतिहास खुद को दोहराता है


वह सितंबर का महीना था और साल 1939. तारीख थी 17, जब जोसेफ वी स्तालिन (Joseph V Stalin) की रूसी फौजों ने पूरब की तरफ से पोलैंड पर हमला कर दिया था. बिना किसी ऐलान या पूर्व सूचना के. इसके करीब 16 दिन पहले इसी मुल्क पर पश्चिम की तरफ से एडोल्फ हिटलर (Adolf Hitler) की जर्मन सेना ने धावा बोला था. बड़े हिस्से पर कब्जा जमा लिया था और वह आगे बढ़ रही थी. लेकिन दूसरी ओर से रूसी फौज के औचक हमले ने उनके सामने परेशानी पेश कर दी. जबकि अभी महीना भी नहीं हुआ था, उस समझौते (हिटलर-स्तालिन समझौता) को जिसमें दोनों ताकतों ने तय किया था कि वे एक-दूसरे के खिलाफ नहीं लड़ेंगी. एक-दूसरे के दुश्मन मुल्कों का भी साथ नहीं देंगी. बावजूद इसके यह हमला? बहरहाल, बीच का रास्ता निकला. करीब 20 दिन बाद लड़ाई खत्म हुई. पोलैंड (Poland) को 2 हिस्सों में बांट दिया गया. एक जर्मनी के हिस्से में गया. दूसरा- सोवियत संघ (USSR) के पास रहा.

लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई. बल्कि उसका कोई सिरा हिटलर (Hitler) के दिमाग में अटक गया था, कहीं. इससे वह बेचैन हुआ जाता था. लिहाजा, उसने फिर अपनी फौज के बंध खोल दिए. अबकी बार उन्हें सोवियत संघ पर चढ़ाई करने के लिए हुक्म दे दिया. यह तारीख थी, 22 जून और साल 1941 का. जर्मन सेना के अभियान को ‘ऑपरेशन बरबरोस्सा’ (Operation Barbarossa) नाम दिया गया था. हिटलर को भरोसा था कि 3 महीने में जर्मनी की फौजें पूरे सोवियत संघ को कब्जे में ले लेंगी. और उधर स्तालिन को यकीन कि हिटलर उस समझौते को नहीं तोड़ेगा, जो 23 अगस्त 1939 को उनके बीच हुआ था. इसीलिए जब रूस के जासूसों और दूसरे देशों के राजनयिकों ने भी, अपनी-अपनी खुफिया सूचनाओं के हवाले से स्तालिन को हिटलर के इरादों के बाबत चेताया, तो उसने कान नहीं दिए. इसका नतीजा सामने था. जर्मनी की फौजें लगातार सोवियत संघ की सीमाओं के भीतर एक के बाद एक इलाके जीतती जा रही थीं.

हिटलर घोषित कर चुका था कि ‘स्लाविक’ भाषा बोलने वाली पूरी नस्ल (जो रूस और उसके आसपास रहते थे) दोयम दर्जे की है. अनार्य है. उसे धरती पर रहने का कोई हक नहीं है. उसे पूरी तरह खत्म कर उसकी जगह जर्मन आर्य-नस्ल के लोगों को बसाया जाना चाहिए. लिहाजा, नस्ली श्रेष्ठता के इस दंभ के नतीजे में जर्मन-फौजें बुरी तरह सोवियत संघ में कत्ल-ए-आम मचा रही थीं. ऐसी ही एक घटना में खारकीव (वर्तमान यूक्रेन का शहर) में 15,000 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था. लेनिनग्राद (रूस के वर्तमान राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन का शहर) में भी करीब 10 लाख लोग मारे गए. यूक्रेन के ही शहर कीव (वर्तमान राजधानी) के नजदीक बाबी यार में 34,000 यहूदियों को अमानवीय यातनाएं देकर मार दिया गया. महिलाओं और बच्चों को भी नहीं छोड़ा गया. यूक्रेन जैसे इलाकों में स्टेपन बैंडेरा की अगुवाई वाले अलगाववादी सीधे-सीधे जर्मन फौज की मदद कर रहे थे. सोवियत संघ के सामने अस्तित्त्व का संकट था.

तब मौसम ने मदद की. अब तक करीब 2 साल बीत चुके थे. सर्दियां बीते साल भी पड़ीं, पर शायद उतनी जिसे जर्मन सैनिक बर्दाश्त कर पाते. मगर 1943 के जाड़ों ने जर्मन फौज का हाल-बेहाल कर दिया. साथ ही लंबा खिंचा अभियान भी जर्मन फौज का हौसला तोड़ने लगा था. रशद खत्म हो रही थी. उधर, सोवियत संघ के देशभक्त गुरिल्ला सैनिक जर्मन फौज पर लगातार हमले कर रहे थे. ऐसी एक खूनी लड़ाई में उन्होंने जर्मन सैनिकों से दक्षिणी रूस का स्तालिनग्राद (वर्तमान में वोल्गोग्राद) शहर छीन लिया. बताते हैं कि इस शहर में हुईं खूंरेजी में करीब 20 लाख लोग मारे गए थे. इनमें दोनों तरफ के सैनिक थे. आम नागरिक भी. अलबत्ता, इस शहर पर मिली जीत ने जर्मन सैनिकों का हौसला पस्त कर दिया. वहीं सोवियत फौजों के हौसले को ऐसा बुलंद किया कि वे जर्मन सैनिकों को खदेड़ते हुए जर्मनी की राजधानी बर्लिन तक जा पहुंचीं. आसन्न पराजय देख हिटलर ने 30 अप्रैल 1945 को एक सैन्य बंकर में खुद को गोली से उड़ा लिया.

इस घटना के 8 रोज बाद बर्लिन में जर्मन संसद पर साम्यवादी ‘लाल झंडा’ फहरा रहा था. जर्मनी इस युद्ध में हार चुका था. उसकी वजह से शुरू हुआ दूसरा विश्वयुद्ध निर्णायक मुकाम पर पहुंच गया था. कहते हैं, करीब 2.75 करोड़ लोगों की जान इस लड़ाई में गई, तब कहीं सोवियत संघ को यह जीत नसीब हुई थी. जीत की ये तारीख (Victory Day) जर्मनी और यूरोप में 8 मई 1945 थी. जबकि रूस में इस वक्त 9 मई की तारीख शुरू हो चुकी थी. लिहाजा, इस लड़ाई और जीत में हिस्सेदार रहे लियोनिद ब्रेझनेव (Lioned Brezhnev) जब सोवियत संघ के शासक बने, तो उन्होंने इसी तारीख को 1965 में राजधानी मॉस्को में ‘विजय दिवस’ (Victory Day) मनाने का सिलसिला शुरू किया. यह आज भी रूस में मनाया जा रहा है. 

लेकिन इस बार ‘विजय-दिवस’ की कहानी कुछ और है

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