America: Coca-Cola ने माना दुनिया के लिए हरा रंग है खतरा, अब बदल जाएंगे स्प्राइट के बोतल का कलर


Sprite Colour Change- India TV Hindi News
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Highlights

  • स्प्राइट की लगभग उम्र 60 साल हो चुकी है
  • साल में लगभग 30 लाख टन से अधिक प्लास्टिक का प्रयोग करता है
  • कंपनी की स्थापना 18 मई 1886 की गई थी

Coca-Cola: स्प्राइट का मतलब रास्ता क्लियर है ये विज्ञापन आपने अक्सर टीवी पर देखा होगा। गर्मी के दिन आते ही हम सबको सॉफ्ट ड्रिंक की तलब लग जाती है। कई लोग तो कोल्ड ड्रिंक के आदि भी होते। स्प्राइट पीने वाले लोगों के लिए ये खबर खास है। स्प्राइट अपने बोतल का रंग क्यों बदलने जा रहा हैं इसके बारे में विस्तार पूर्वक चर्चा करेंगे।

स्प्राइट ने अपने बोतल का रंग बदलने का फैसला किया है। हरे रंग में दिखने वाली बोतले अब सफेद रंग में दिखेंगे। अमेरिकी कंपनी कोको-कोला ने ये फैसला लिया है। स्प्राइट को कोको-कोला बनाती है। अब स्प्राइट की लगभग उम्र 60 साल हो चुकी है। आज से ठीक 60 साल पहले अमेरिकी कंपनी कोको- कोला ने स्प्राइट को हरे रंग की बोतल में लांच किया था।

 

आखिर कोको-कोला ने ये कदम क्यों उठाए?

1 अगस्त से दुनिया के बाजारों में स्प्राइट हरे रंग की जगह अब सफेद रंगों में दिखने लगेंगे। कोको-कोला ने बताया कि यह फैसला पर्यावरण के बेहतरी के लिए लिया गया है। हालांकि कोको कोला ने ये फैसला फिलीफिंस समेत यूरोपीय देशों में पहले ही ले लिया था। फिलिफिंस में 2019 से ही सफेद कलर की बोतल में स्प्राइट बिक रही है। कंपनी नॉर्थ अमेरिका से इसकी शुरुआत करेगी और फिर पूरी दुनिया में हरे रंग की बोतलों को रिप्लेस करेगी। अब कंपनी को हरे रंग से क्या दिक्कत हो रही थी और इसमें एनवायरमेंट का क्या लॉजिक है? आइए विस्तार से समझते हैं। वर्तमान में स्प्राइट का बोतल जिस प्लास्टिक से बनाया जाता है उस प्लास्टिक का नाम टेरेफ्लेथेट है। इस प्लास्टिक को रिसाइकिल तो कर सकते हैं लेकिन फिर से नए बोतल के रूप में नहीं ढाल सकते हैं। रंगीन बोतलों को रिसाइकिल करना आसान नहीं होता है रंगीन बोतलें प्रदूषण ही फैलाता है।हालांकि इनसे कपड़े और कारपेट बनाए जा सकते हैं। साथ ही साथ इस प्लास्टिक को रिसाइकिल करना भी मुश्किल का काम होता है। कपंनी ने बताया कि प्लास्टिक का मार्केट बड़ा नहीं है जिसे बेच कर मुनाफा निकाला जा सकें।

प्लास्टिक पर्यावरण के लिए एक खतरा

एक तरफ दुनिया में क्लाइमेट चेंजिंग, ग्लोबल वार्मिंग से जुड़ी खबरें प्रतिदनि आ रही है। इसी वक्त कोको ने ये फैसला लेकर एक सकरात्मक पहल किया है। आपको बता देें, कोका एक साल में लगभग 30 लाख टन से अधिक प्लास्टिक का प्रयोग करता है। आमतौर पर देखा जाता है कि कोल्ड्रिंक पीने के बाद लोग इसे कचरा में फेंक देते हैं ये फिर मिट्टी, नालें और नदियों में मिलकर गंदगी फैलाते हैं। अगर आप कभी संमुद्र के किनारे पर गए होंगे तो देखा होगा कि कैसे किनारों पर इस प्रकार के बोंतलों की एक खेप लगी रहती है। ये प्लास्टिक संमुद्र में रहने वाले जीव-जतुंओं के लिए जहर के समान होता है।
 

क्या है Coca का इतिहास?

ऐसा कहा जाता है कि कोका-कोला गलती से बन गया था। आप ये सुनकर हैरान होंगे लेकिन ये सच है। जॉन पेम्बर्टन स्टाइथ ने इसे गलती से बना दिया था। दरअसल जॉन सिर्द दर्द के लिए कोला नट और कोला की पत्तियों का मिश्रण कर एक प्रयोग कर रहे थे लेकिन लैब एक कर्मचारी ने दोनों को कार्बोंनेटेड वॉटर से मिला दिया। जिसका टेस्ट चखा गया तो एक बेहतरीन पेय़ पर्दाथ बन गया यानी आपका फेवरेट कोका कोला बन गया। इस कंपनी की स्थापना 18 मई 1886 की गई थी।

 

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