Explainer: फिनलैंड-स्वीडन ने नाटो में जाने का राग अलापा, बौखलाया रूस, क्या युद्ध और व्यापक होगा? जानिए क्या है पूरी डिप्लोमेसी


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Highlights

  • स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों की नाटो में एंट्री होगी आसान?
  • फिनलैंड के नाटो का सदस्य बनने पर क्यों बौखलाया रूस
  • रूस के साथ 1340 किलोमीटर का बॉर्डर शेयर करता है फिनलैंड

Explainer: रूस और यूक्रेन के बीच जंग खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। इसी बीच रूस के और पड़ोसी देश भी नाटो में जाने का राग छेड़ रहे हैं। दरअसल, यूक्रेन से युद्ध की शुरुआत ही यूक्रेन के नाटो में जाने की जिद के कारण हुई थी। इसके बाद रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया। अब स्वीडन, फिनलैंड जैसे देश भी जब नाटो में जाने का दम भरने लगे हैं, ऐसे में रूस का बौखलाना स्वाभाविक है। दोनों देशों का यह फैसला खास इसलिए है, क्योंकि दोनों ही देश मौजूदा यूक्रेन जंग में तटस्थता  के लिए जाने जाते रहे हैं। फिनलैंड को तो रूस ने बड़े शब्दों में चेतावनी भी दे दी है। जानिए नाटो संगठन में ये देश जाने के लिए आखिर क्यों छटपटा रहे हैं। रूस को इससे क्या परेशानी है। क्या यूक्रेन की तरह इन देशों को भी रूस जंग के रास्ते पर चलकर सबक सिखाएगा यानी क्या युद्ध अब व्यापक रूप लेगा? हम एक्सपर्ट्स की राय भी जानेंगे।

  • विदेश मामलों जानकार और फॉरेन पॉलिसी और इंटरनेशनल अफेयर्स से संबंधित कई पुस्तकों के लेखक डॉक्टर रहीस सिंह बताते हैं कि रूस की यह लड़ाई सिर्फ यूक्रेन से नहीं है। नाटो का 1991 के बाद विस्तार चलता आ रहा है। पूर्वी यूरोप और यूरेशिया, कॉकेशस के पार्ट पर नाटो अपना नियंत्रण करना चाहता है। सीधी सा गणित है, यदि रूस इस पर कब्जा करेगा तो वह पॉवरफुल बनेगा, यदि अमेरिका करेगा तो वह पॉवरफुल बनेगा। यह लड़ाई पिछली सदी के कोल्ड वॉर के समय से चली आ रही है।
  • फिनलैंड, स्वीडन जैसे देश भले ही अभी नाटो के सदस्य न हों, लेकिन उन्हें नाटो का समर्थन और सुरक्षा कवच पहले ही मिल रहा था। रहीस सिंह कहते हैं कि यह युद्ध लंबा चलेगा, या रूस अन्य देशों पर भी हमला करेगा, ऐसा मुश्किल लग रहा है। क्योंकि इससे इकोनॉमी पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। हां, यह लड़ाई आगे चलकर कोल्ड वॉर में बदल सकती है। रूस और अमेरिका फिर कोल्ड वॉर की स्थिति में पहुंच सकते हैं। क्योंकि यह लड़ाई रूस और यूक्रेन की नहीं है, बल्कि रूस और अमेरिका के यूरेशिया, पूर्वी यूरोप और कॉकेशस इलाके पर वर्चस्व की है।

नाटो में क्यों जाना चाहते हैं फिनलैंड, स्वीडन जैसे देश?

फिनलैंड रूस के साथ 1340 किलोमीटर का बॉर्डर शेयर करता है। फिनलैंड और रूस (तब का सोवियत संघ) दूसरे विश्व युद्ध में विरोधी पक्ष में थे। यूक्रेन पर हमला कर व्लादिमीर पुतिन ने उत्तरी यूरोप में लंबे समय से चली आ रही स्थिरता की भावना को चकनाचूर कर दिया है, जिससे स्वीडन और फिनलैंड असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

 क्या स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों की नाटो में एंट्री होगी आसान?

स्वीडन, फिनलैेंड जैसे देश नाटो में जाने की बात भले ही कह रहे हों, लेकिन यूक्रेन की ही तरह इन्हें भी अमेरिका जल्दी ही और आसानी से नाटो में शामिल कर लेगा, अभी यह कहना मुश्किल है। नाटो देशों पर अमेरिकी सुरक्षा के लिए खर्च भारी भरकम होता है। नाटो देशों को ट्रंप ने भी अपने राष्ट्रपति के कार्यकाल के दौरान कहा था कि जो देश नाटो के सदस्य हैं, उन्हें अपनी जीडीपी का 2 फीसदी नाटो पर खर्च करना चाहिए, जो कि आज के इकोनॉमिक क्राइसिस के दौर में बहुत मुश्किल है। ऐसे में उन्हें अपने ही देशों में विरोध का सामना करना पड़ेगा। हालात श्रीलंका जैसे हो सकते हैं। दरअसल, 2011 से नाटो को वित्तीय परेशानियां आ रही हैं। इकोनॉमिक क्राइसिस के दौर में यह और मुश्किल हो रहा है।

फिनलैंड के नाटो का सदस्य बनने पर क्यों बौखलाया रूस, जानिए कारण

फिनलैंड यदि नाटो का सदस्य बन भी गया तो उसके सदस्य बनने से रूस को उत्तर की तरफ से भी खतरा महसूस हो सकता है। इसके अलावा रूस का प्रमुख शहर और आर्थिक राजधानी सेंट पीटर्सबर्ग भी असुरक्षित हो सकता है। फिनलैंड बाल्टिक सागर के किनारे बसा देश है। ऐसे में अगर नाटो चाहे तो एस्टोनिया और फिनलैंड के बीच नाकेबंदी कर रूस को घेर सकता है। एस्टोनिया पहले से ही नाटो का सदस्य है। इस कारण पूरे बाल्टिक सागर में रूस की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। इसका बुरा प्रभाव रूस के समुद्री व्यापार पर पड़ेगा। यही कारण है कि रूस नहीं चाहता है कि नाटो उसकी उत्तरी सीमा के करीब पहुंचे।

पुतिन के पास क्या हैं विकल्प?

अगर सैन्य ताकत की बात की जाए तो रूस तो दूर फिनलैंड यूरोप के भी कई छोटे-छोटे देशों के मुकाबले काफी कमजोर है। ऐसे में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन फिनलैंड सीमा पर भारी हथियारों की तैनाती कर सकते हैं। इससे फिनलैंड के ऊपर एक तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ेगा। इतना ही नहीं, रूसी सेना फिनलैंड की सीमा पर चौकसी और अपनी गतिविधियों को भी बढ़ा सकती है। इससे भी फिनलैंड की अपेक्षकृत कमजोर फौज पर भारी दबाव पड़ेगा।





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